Why Pezeshkian Thinks Iran Won The Recent War Against The West

Why Pezeshkian Thinks Iran Won The Recent War Against The West

मसूद पेज़ेशकियान का नया दावा और मध्य पूर्व की बदलती हकीकत

ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियान ने हाल ही में देश की सेना और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ़ तौर पर कहा कि आज पूरी दुनिया ईरान को एक शक्तिशाली और सम्मानित राष्ट्र के रूप में देखती है। पेज़ेशकियान के मुताबिक, विरोधियों को सबक सिखाने और उनके मंसूबों को नाकाम करने का पूरा श्रेय देश के सैनिकों और उनके सर्वोच्च बलिदान को जाता है।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब हाल के हफ्तों में मध्य पूर्व में भारी सैन्य तनाव देखा गया है। राष्ट्रपति ने दावा किया कि दुश्मनों को लगता था कि वे कुछ ही दिनों में ईरान सरकार को घुटनों पर ला देंगे और वहां अपनी मर्जी की कठपुतली सरकार बिठा देंगे। लेकिन ईरानी सेना के कड़े पलटवार ने उनके समीकरणों को पूरी तरह बदल कर रख दिया।

तीन दिन में तख्तापलट का सपना और 100 मिसाइल लहरों का पलटवार

मसूद पेज़ेशकियान ने अशुरा के एक कार्यक्रम में बोलते हुए साफ़ कहा कि अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ जो मोर्चा खोला था, उसका मकसद तेहरान को तीन दिन के भीतर तबाह करना था। उनका इशारा हालिया महीनों में हुए बड़े हवाई हमलों, सैन्य कमांडरों की हत्याओं और परमाणु प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की कोशिशों की तरफ था।

ईरान का मानना है कि इस चौतरफा दबाव के बावजूद उसकी सेना पीछे नहीं हटी। पेज़ेशकियान ने गर्व से कहा कि सेना, आईआरजीसी और बशीज बलों ने मिलकर 'ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस 4' के तहत दुश्मनों पर 100 से ज्यादा लहरों में बैलिस्टिक और हाइपरसोनिक मिसाइलें दागकर कड़ा जवाब दिया। राष्ट्रपति ने कहा कि परमाणु संपन्न ताकतों को यह अंदाजा नहीं था कि एक सीमित संसाधनों वाला देश इस तरह सीधे उनके सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की हिम्मत दिखाएगा।

क्षेत्रीय कूटनीति और वाशिंगटन के साथ चल रही समानांतर बातचीत

इस पूरे सैन्य आक्रामक रुख के बीच पेज़ेशकियान सरकार एक बेहद पेचीदा कूटनीतिक खेल भी खेल रही है। एक तरफ जहां सेना को दुश्मन को सबक सिखाने का क्रेडिट दिया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ स्विट्जरलैंड के जरिए अमेरिका के साथ पर्दे के पीछे बातचीत भी जारी है। हाल ही में कतर में फ्रीज की गई 6 अरब डॉलर की ईरानी संपत्ति को बहाल करने को लेकर दोनों देशों के बीच प्रारंभिक सहमति बनी है।

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पेज़ेशकियान की रणनीति साफ़ है। वे अपनी सेना की ताकत का इस्तेमाल टेबल पर मोलभाव करने के लिए एक मजबूत हथियार के रूप में कर रहे हैं। उन्होंने साफ कर दिया है कि ईरान अपने यूरेनियम संवर्धन के अधिकार को कभी नहीं छोड़ेगा और न ही उसका बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम किसी भी वैश्विक वार्ता का हिस्सा बनेगा। यानी, सेना सीमा पर दुश्मन को रोक रही है और सरकार उसी सैन्य ताकत के दम पर दुनिया के सामने आंखें मिलाकर बात कर रही है।

जमीनी हकीकत और आगे की राह

राष्ट्रपति के इस बयान को केवल एक राजनीतिक भाषण के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे ईरान की आंतरिक राजनीति और जनता के मनोबल को बनाए रखने की मजबूरी भी है। आर्थिक प्रतिबंधों और हालिया आंतरिक उथल-पुथल से जूझ रहे ईरान के लिए अपनी सैन्य संप्रभुता का प्रदर्शन करना बेहद जरूरी है।

इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब आगे की राह को समझने के लिए कुछ जरूरी रणनीतिक कदमों पर ध्यान देना होगा।

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  • क्षेत्रीय गठबंधनों को मजबूत करना: ईरान अब मुस्लिम देशों के बीच एक नया सुरक्षा ढांचा तैयार करने की वकालत कर रहा है ताकि बाहरी ताकतों के दखल को कम किया जा सके।
  • परमाणु कार्यक्रम पर अड़े रहना: अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील और कतर के रास्ते फंड मिलने के बावजूद, तेहरान परमाणु संवर्धन के स्तर को कम करने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
  • ड्रोन और मिसाइल तकनीक का निर्यात: यूक्रेन और अन्य मोर्चों पर ईरानी हथियारों की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया है कि वह तकनीकी रूप से अब आत्मनिर्भर हो चुका है।

पेज़ेशकियान का यह नया रुख दिखाता है कि ईरान रक्षात्मक रणनीति से बाहर निकलकर सीधे आक्रामक मुद्रा में आ चुका है। वह अपनी शर्तों पर कूटनीति करना चाहता है, जहां उसकी सेना ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।

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Chloe Price

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